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Thursday, 2 November 2017

भारत में प्रेस का विकास

भारत में पुर्तगाली पहले लोग थे जिन्होंने मुद्रणालय की स्थापना की। 1557 में पहली पुस्तक छपी।
भारत में आधाुनिक प्रेस का प्रारंभ 1766 में विलियम वोर्डस द्वारा प= निकालने की योजना और 1780 में जेम्स आगस्टस हिक्की द्वारा बंगाल गजट के प्रकाशन से हुआ। किसी भारतीय द्वारा प्रकाशित पहला समाचार प= गंगाधार भट्टाचार्य द्वारा प्रकाशित बंगाल गजट था जिसका प्रकाशन 1816 में हुआ। 1821 में बंगाली में संवाद कौमुदी और 1822 में फ़ारसी में मिरातउल अखबार के प्रकाशन के साथ प्रगतिशील राष्ट्रीय प्रड्डति वाली समाचार पत्रें का प्रकाशन हुआ।
राज राममोहन राय ने ब्रह्मनिकल मैगजीन, चंद्रिका जैसे पत्रें की भी शुरूआत की। इन्होंने ही द्वारिकानाथ टैगोर के साथ 1830 में बंगदत्त की स्थापना की। उधार 1822 में बंबई से भारत का पहला दैनिक समाचार प= ‘बंबई समाचार’ गुजराती भाषा में निकलने लगा। बंबई से ही गुजराती में 1821 में जानेजमशेद एवं 1851 में रास्तगाफ़ेतार तथा अखबार-ए-सोदागर का प्रकाशन आरंभ हुआ। रास्तगाफ़ेतार का संपादन दादाभाई नौरोजी करते थे।
(अन्य समाचार पत्रें का विवरण अलग से सारणी में है)
अंग्रेजी प्रशासन ने प्रारंभ से ही प्रेस पर नियं=ण रखने का प्रयास किया। शासन द्वारा पारित प्रमुख अधिानियमों में थे।
सेंसरसिप ऑफ़ प्रेस एक्ट (1799) - लार्ड वेलेजली के काल में इस अधिानियम के अंतर्गत समाचार पत्रें पर युद्वकालीन सेंसर लागू किया गया।
लाइसेंसिंग रेगुलेसन ऑफ़ 1823
1823 में जॉन एडम्स के द्वारा इस अधिानियम को समाचार पत्रें के प्रकाशन के पूर्व लाइसेंस को अनिवार्य बनाने के लिए लागू किया गया। इस अधिानियम के कारण मिरातउल अखबार का प्रकाशन बंद हो गया।
लिबरेशन ऑफ़ इंडियन प्रेस (1825)
चार्ल्स मैटकाफ़ के द्वारा इस अधिानियम के माफऱ्त पुराने अधिानियमों को निरस्त किया गया। इसके अनुसार प्रकाशकों को केवल प्रकाशन के स्थान की सूचना देनी होती थी।
लाइसेंसिंग एक्ट ऑफ़ 1857
इसके माधयम से समाचार पत्रें में लाइसेंसिंग को पुनः अनिवार्य बनाया गया।
रजिस्ट्रेशन एक्ट ऑफ़ 1867
इस अधिानियम के माधयम से समाचार पत्रें के प्रकाशन को नियमित करने का प्रयास किया गया। 1869-70 में इसमें संशोधान कर इंडियन पिनल कोड में राजद्रोह के विरूद्व धाारा 124 जोडी गई।
वर्नायूलर प्रेस एक्ट 1878
लिटन के काल में बडी संख्या में स्थापित भारतीय प्रेस को सरकार की आलोचना करने से रोकने के लिए इसे पारित किया गया। इसे मुंहबंद करने वाला अधिानियम भी माना जाता है।
यह अधिानियम सोमप्रकाश जैसे अखबारों को केन्द्र में रखकर पारित किया गया था। 1882 में इस अधिानियम को लार्ड रिपन ने रद्द कर दिया।
न्यूजपेर एक्ट 1908
यह अधिानियम कर्जन द्वारा कांग्रेस के उग्रवादी विचारधाारा के समर्थक पत्रें के विरूद्व लाया गया। इसके अनुसार सरकार को आपत्तिजनक सामग्रीयों के प्रकाशन पर किसी भी प= के ंपजीकरण को रद्द कर देने का अधिाकार था।
इंडियन प्रेस एक्ट 1910
इस अधिानियम के अंतर्गत पंजीकरण की राशि को बढाकर 2000 रूपए किया गया। साथ ही लिटन के 1878 के अधिानियम की शर्तो को पुर्नजीवित किया गया।
इंडियन प्रेस (इमरजेंसी पावर) एक्ट 1931
तेज बहादुर स्प्रू की अधयक्षता में 1910 की अधिानियम के रद्द होने के बाद इस अधिानियम के माधयम से 1910 की अधिानियम को पुर्नजीवित किया गया।
स्वतं=ता के बाद 1950 में नये संविधाान के लागू होने के बाद सरकार ने 1951 की         अधिानियम के तहद आपत्तिजनक सामग्रियों के प्रकाशन पर समाचार पत्रें की पंजीकरण को रद्द करने से संबंधिात कुछ नये नियम बनाये।

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