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Tuesday, 12 July 2016

शहरी बेरोजगारी के नए अंधेरे


एक हालिया खुलासे ने अवसरों के केंद्र माने जा रहे शहरों की कलई खोल कर रख दी है। यह जानकारी देश में पहली बार साल की तिमाही में बेरोजगारी दर का आकलन करने से सामने आई है। अमेरिका की तर्ज पर ये आंकड़े सवा लाख लोगों से पूछताछ कर सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएसआईई) ने जुटाए हैं, जिनसे पता चला है कि देश में बेरोजगारी की दर फिलहाल 8.37 फीसद है। इसमें ज्यादा चौंकाने वाली बात यह है कि साल की पहली तिमाही में गांवों से ज्यादा शहरों में बेरोजगारी की बात कही गई है। शहरी बेरोजगारी की गर 9.99 फीसद है, जबकि गांव-देहात में यह दर 8.05 फीसद।
अभी सरकार का काफी जोर आधुनिक (स्मार्ट) शहर बनाने-बसाने पर है। यह बात अरसे से कही जाती रही है कि देश की आबादी की बढ़ती जरूरतों और उसे रोजगार दिलाने के मद्देनजर पैदा होने वाली समस्याओं से निपटने का एकमात्र उपाय यही है कि ज्यादा से ज्यादा नए और बेहतरीन शहर बसाए जाएं। लेकिन पहले से बसे पुराने शहर ही नहीं, बसाए जा रहे नए स्मार्ट शहर गरीबों और आस-पड़ोस के गांव-कस्बों के बेरोजगारों को कुछ जगह दे पाएंगे- यह उम्मीद खोखली लगने लगी है। इसकी वजहों का एक खुलासा कुछ अरसा पहले राजधानी दिल्ली के बारे में उजागर हुए एक आंकड़े से हो चुका है।
दो बरस पहले किए गए आकलन के अनुसार पड़ोसी राज्यों से रोजगार के सिलसिले में आने वाले 2.7 लाख लोग यहां छह महीने भी नहीं टिक पाते हैं। वे यहां अच्छे रोजगार और बेहतर जीवनशैली की खोज में आते तो हैं, लेकिन क्रूर सच्चाइयों से रूबरू होते ही उनका मोहभंग हो जाता है। लिहाजा, उन्हें जल्द ही यहां से अपना बोरिया-बिस्तर समेट लेना पड़ता है और हताश-निराश होकर अपने उन्हीं गांव-कस्बों में लौट जाना पड़ता है जहां रोजगार के बेहद सीमित विकल्प हैं। 2001 की जनगणना के आंकड़ों से साफ हुआ कि अब दिल्ली जैसे महानगर भी बाहरी राज्यों के श्रमिकों को लेकर निर्मम हो गए हैं। बाहर से रहे ऐसे लोगों को महानगरों में ऐसी कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है जिनकी वजह से वे यहां अपना प्रवास जल्द ही खत्म करने को मजबूर हो जाते हैं।
जनगणना के आंकड़ों के मुताबिक दिल्ली में औसतन 2 लाख 80 हजार श्रमिक ऐसे होते हैं जिनका दिल्ली से जल्द ही मोहभंग हो जाता है और वे वापस चले जाते हैं। पिछले दस साल में ऐसे श्रमिकों के अपने मूल स्थानों की ओर पलायन की दर इक्कीस प्रतिशत रही है जो शहरों की हकीकत से हमारा सामना कराती है। ऐसे श्रमिकों के वापस पलायन के कारणों की तलाश की गई तो पता चला कि तीन बड़ी वजहें हैं। पहला कारण यहां की महंगाई है, जिसका सामना इन लोगों को आवास का इंतजाम करने से लेकर कार्यस्थल तक आने-जाने और खानपान में करना पड़ता है। दूसरी वजह है अस्थायी काम या दोबारा काम मिलना, और तीसरी अहम वजह है, दिल्ली जैसे बड़े शहरों में मैन्युफैक्चरिंग के बजाय सर्विस सेक्टर का उभरना, जिसमें पड़ोसी राज्यों के अकुशल या अर्धकुशल मजदूरों की कोई जरूरत नहीं रह गई है। हालांकि एक चौथी वजह मनरेगा जैसी योजनाएं हैं जिनमें लोगों को अपने गांव-कस्बों में ही अस्थायी किस्म का रोजगार मिलने लगा है, पर एक सच्चाई यह है कि शहरों में अब तक मिलते आए स्थायी किस्म के रोजगारों की जगह मनरेगा नहीं ले सकता है। लेकिन अब जो तकलीफ शहरों के उजड़ते हुए लोगों की है, वह एक नई बात है और इसका संज्ञान लिया जाना चाहिए।
शहरी बेरोजगारी के कुछ पहलू और हैं जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। शहरों में युवाओं में डिग्री-सर्टिफिकेट जमा करने की एक ऐसी होड़ पिछले कुछ दशकों में विकसित हो गई है, जो उन्हें डिग्रियों से तो जोड़ती है लेकिन इस लायक नहीं बनाती कि वे किसी ठीकठाक रोजगार में खुद को काबिल ठहरा सकें। विभिन्न कंपनियों के लिए रोजगार संबंधी समाधान सुझाने वाले संगठनएस्पायरिंग माइंड्सने कई सर्वेक्षणों में पाया है कि देश में ऐसे युवाओं का प्रतिशत सैंतालीस तक जा पहुंचा है जो किसी भी नौकरी के योग्य नहीं।
इन सर्वेक्षणों का एक निष्कर्ष यह भी है कि ये ज्यादातर युवा अंग्रेजी में काफी कमजोर होते हैं, इस लिहाज से नौकरी के काबिल नहीं पाए जाते। सर्वे में शामिल युवाओं की कुछ और कमियां भी गिनाई गई हैं, जैसे उनका बुनियादी ज्ञान चौपट होता है और सबसे अहम यह है कि उनमें से चालीस फीसद ने ऐसे कॉलेजों से पढ़ाई की है, जिनकी गिनती देश के शीर्ष तीस कॉलेजों में नहीं होती है। ये सर्वे कुछ साबित करें या नहीं, यह सच है कि इधर कुछ बरसों में उन युवाओं की भारी फौज देश में तैयार हो गई है जो खुद को शिक्षित बेरोजगार कहते हैं, लेकिन उनमें वैसे कौशल का अभाव है जो उन्हें किसी काम के लिए एक योग्य उम्मीदवार के तौर पर पेश करे। हालांकि एक दौर था, जब काम करने की इच्छा के साथ किसी भी ठीकठाक कॉलेज की डिग्री काम दिलाने में काफी मददगार होती थी। पर अब डिग्रियां भी काफी नहीं हैं, जरूरी है कि युवा डिग्री के बजाय किसी कौशल से लैस हों।
शहरों में युवाओं का अभी ज्यादा ध्यान बाबूगिरी वाली सफेदपोश नौकरियों पर होता है। मुश्किल यह है कि अब निजी कंपनियां भी सामान्य बीए-एमए पास तो छोड़िए, किसी ट्रेड से जुड़े डिग्री-डिप्लोमा रखने वाले नौजवान के बजाय उन्हें नौकरी देने में ज्यादा दिलचस्पी दिखा रही हैं जो कायदे की कोई डिग्री नहीं रखता, लेकिन पांच-दस जगह संबंधित काम कर चुका है। इसका संकेत पिछले साल श्रम ब्यूरो द्वारा 2014 की बाबत पेश की गई रिपोर्ट से मिला था, जिसमें बताया गया था कि कुछ ऊंची नौकरियों को छोड़ दें तो भारत के रोजगार-प्रदाता किसी को छोटी या मझोली नौकरी पर रखते वक्त उसके कौशल से ज्यादा उसके तजुर्बे को परखते हैं।
कंपनियों को लगता है कि डिग्री-सर्टिफिकेट रखने वाले के मुकाबले एक अकुशल व्यक्ति, जो दस जगह धक्के खाता हुआ बेहतर काम की तलाश में उनके पास पहुंचा है, उनके लिए ज्यादा काम का साबित होता है, क्योंकि वह तुलनात्मक रूप से पैसे भी कम मांगता है और पहले ही दिन से संतोषजनक नतीजे भी देना शुरू कर देता है। निश्चय ही, श्रम ब्यूरो के अध्ययन के नतीजे लोगों को डिप्लोमा लेने से हतोत्साहित करने वाले हैं। इनके मुताबिक आईटीआई या किसी और स्किल सेंटर से डिप्लोमा लेकर निकले व्यक्तियों में बेरोजगारी की दर साढ़े चौदह प्रतिशत है। सिविल और कंप्यूटर इंजीनियरिंग के क्षेत्रों को छोड़ दें तो बाकी सभी क्षेत्रों के डिप्लोमाधारकों में पचीस फीसद से भी ज्यादा लोग बेरोजगार हैं। खासकर कपड़ा उद्योग संगठित क्षेत्र में भारतीय युवाओं को सबसे ज्यादा रोजगार देता रहा है, लेकिन अभी हालत यह है कि इससे संबंधित कौशल-प्रशिक्षण लेकर निकले लोगों में सत्रह फीसद बेरोजगार हैं। रिपोर्ट बताती है कि पिछले दस सालों में हर साल 1 करोड़ 20 लाख लोग रोजगार-बाजार में रहे हैं, लेकिन हर साल औसतन पचपन लाख लोगों को ही मुश्किल से कोई रोजगार मिल पा रहा है।
सवाल है कि आखिर शहरी नौजवान ऐसा क्या करें जो उन्हें कायदे के रोजगार की तरफ ले जाए। योजनाकारों और समाजशास्त्रियों की अहम सलाह यह है कि युवाओं के लिए बेहतर होगा अगर वे खुद को समयकाटू पढ़ाई से और महज डिग्रियां बटोरने की प्रवृत्ति से बचाते हुए या तो अपना कोई कामधंधा शुरू करने के बारे में सोचें या फिर उन छोटी नौकरियों-कामकाज के लिए तैयार हों, जिनमें किसी डॉक्टर-इंजीनियर के बराबर कमाई देने की कुव्वत पैदा हो गई है। मसलन, इलेक्ट्रिशियन, प्लंबर आदि के काम।
ऐसे ही तथ्यों पर नजर रखने वाली एक संस्था टीमलीजके एक सर्वेक्षण के मुताबिक नए इलेक्ट्रिशियन का माहवार आरंभिक वेतन या कमाई 11,280 रुपए, डेस्कटॉप इंजीनियर का वेतन 14,700 रु. और आईटी इंजीनियर का वेतन 17,800 रुपए औसतन हो गया है। इसका निष्कर्ष यह है कि एक ओर जहां अच्छी-खासी डिग्री लेने के बाद भी हजारों-लाखों युवा नौकरी के लिए या तो सालों तक धक्के खाते रहते हैं या फिर बेहद मामूली वेतन की नौकरी करते हुए अपना शोषण करवाते हैं। वहीं दूसरी ओर गली-मुहल्ले की किसी दुकान पर चंद महीने काम सीखने के बाद कोई युवा कैसे भी अपनी दाल-रोटी चलाने का इंतजाम कर लेता है। देश में तेजी से विकसित हुए -कॉमर्स ने डिलीवरी व्बॉय जैसे पेशे में लगे युवाओं की कमाई भी पच्चीस हजार रुपए महीना तक पहुंचा दी है।
साफ है कि शहरों में कुशल और शिक्षित बेरोजगारों की दिनोंदिन लंबी होती कतार को भारत की विकास कथा का हिस्सा बनाने के लिए सिर्फ कोई एक सिरा पकड़ कर काम करना काफी नहीं है। जहां युवाओं को डिग्री के बजाय रोजगार के नए मौके खोज कर उनके लिए खुद को काबिल बनाना होगा, वहीं सरकार के लिए जरूरी है कि अगर नए कौशल प्रशिक्षण केंद्रों के लिए पैसा जारी करती है तो उसे यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि इनसे निकले युवाओं को सिर्फ काम मिले, बल्कि उन्हें उनके कौशल के अनुरूप और बेहतर पगार वाला काम मिले। इसी से शहरी बेरोजगारी का अंधियारा दूर हो सकेगा।


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